तालिबान का जश्न और आम लोगों की बेबसी कहां हैं सालेह और गनी?
बेहिसाब बदहाली कंगाली है तंगहाली है और खून के छीटें भी हैं। आंसुओं का सैलाब अविश्वास भुखमरी और नाउम्मीदी के साथ ही एक अजीब सी आशंका है।अफगानिस्तान में तालिबान राज के स्थापना के एक साल का हासिल बस यही सब है। बंदूक की नोक पर हुक्म चलाने के आदी तालिबानी अमन का आवरण ओढ़ कर आवाम को हांक रहे हैं। कंधार से काबुल तक हर शहर गांव कस्बे में लोग किश्तों में जीने के लिए मजबूर हैं। अफगानिस्तान से अमे.....
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