सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला… निजी जासूसों की बेलगाम कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार… वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता पर तय की बड़ी नजीर…

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला… निजी जासूसों की बेलगाम कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार… वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता पर तय की बड़ी नजीर…

भारतीय न्याय व्यवस्था में वैवाहिक विवादों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश में बेलगाम तरीके से काम कर रहे निजी जासूसों की कार्यप्रणाली पर बेहद कड़ा प्रहार किया है। शीर्ष अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत निजी जासूसी एजेंसियों को कानून की नजर में कोई भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है, और नागरिकों की निजता में दखलंदाजी करने वाली इन एजेंसियों पर तत्काल नकेल कसने की सख्त जरूरत है।


यह कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय ‘हिमांशु चोर्डिया बनाम राजस्थान राज्य’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ द्वारा सुनाया गया है। इस मामले में एक पति ने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाते हुए अंतरिम गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था। अपने दावों को सही साबित करने के लिए पति ने अदालत में निजी जासूसों के माध्यम से जुटाए गए 92 वीडियो और 237 से अधिक तस्वीरें डिजिटल साक्ष्य के रूप में पेश की थीं। अदालत ने इतने बड़े पैमाने पर नागरिकों के निजी जीवन में ताक-झांक कर जुटाए गए इन साक्ष्यों की प्रामाणिकता और निजता के अधिकार के हनन पर गहरी आपत्ति जताई है।


सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तीखी टिप्पणी में पूछा कि आखिर दूसरों की जिंदगी की ये तस्वीरें लेने का अधिकार इन्हें किसने दिया और इन बेहद संवेदनशील डेटा को किस तरह सुरक्षित रखा जाता है? अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना किसी वैधानिक नियंत्रण के काम कर रहे ये जासूस ‘ताक-झांक’ जैसे गंभीर अपराधों को जन्म दे रहे हैं। इस बेलगाम व्यवस्था पर लगाम कसने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव और भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष को इस फैसले की प्रति भेजकर तत्काल कड़े नियम बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि भारत को नीदरलैंड्स, सिंगापुर, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कानूनों का अध्ययन कर एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए।


इसके साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने भरण-पोषण के कानून पर भी एक अहम नजीर पेश की है। अदालत ने कहा कि यदि पति शुरुआत में ही ऐसे अकाट्य सबूत पेश करता है जिससे पत्नी का व्यभिचार तुरंत सिद्ध होता हो, तो अंतरिम गुजारा भत्ता पर उसी समय रोक लगाई जा सकती है। इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ अदालत ने उच्च न्यायालय के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है।

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