Ayodhya Ram Mandir: अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राम मंदिर चढ़ावा विवाद, CBI जांच और देशव्यापी ऑडिट मैकेनिज्म की मांग को लेकर PIL दायर

Ayodhya Ram Mandir: अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राम मंदिर चढ़ावा विवाद, CBI जांच और देशव्यापी ऑडिट मैकेनिज्म की मांग को लेकर PIL दायर

अयोध्या: अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दान और चढ़ावे में कथित वित्तीय हेराफेरी (Financial Irregularities) का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंच गया है। करोड़ों राम भक्तों की आस्था और भावनाओं से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और पूरे मामले की समयबद्ध (Time-bound) जांच कराने की मांग की गई है।


दो वकीलों ने दायर की याचिका निष्पक्ष जांच की गुहार

यह जनहित याचिका सोमवार को देश के दो प्रतिष्ठित वकीलों—अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव—द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के सामने तर्क दिया है कि यह मामला सिर्फ वित्तीय अनियमितता या चंद रुपयों की हेराफेरी का नहीं है। यह उन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, पीढ़ियों के संघर्ष और पवित्र भावनाओं से जुड़ा है, जिन्होंने रामलला के भव्य मंदिर के लिए अपनी गाढ़ी कमाई दान स्वरूप अर्पित की है।


याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को प्रतिवादी बनाते हुए यह निर्देश देने की मांग की गई है कि भविष्य में चढ़ावे की राशि की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र ऑडिट व नियामक तंत्र (Regulatory Mechanism) स्थापित किया जाए।


प्रशासनिक SIT बनाम पेशेवर वित्तीय जांच (CBI) पर बहस

गौरतलब है कि राम मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते 13 जून 2026 को तीन सदस्यीय प्रशासनिक एसआईटी का गठन किया था। इस टीम में लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस. और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं, जो वर्तमान में अयोध्या में रिकॉर्ड्स खंगाल रहे हैं।


हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस प्रशासनिक एसआईटी की कार्यप्रणाली पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए गए हैं:


बिना FIR के जांच: याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार की इस एसआईटी ने बिना किसी आधिकारिक एफआईआर (FIR) या आपराधिक मामला दर्ज किए ही अपनी जांच शुरू कर दी है, जो कानूनी रूप से कमजोर है।

विशेषज्ञता की कमी: याचिकाकर्ताओं का मानना है कि प्रशासनिक अधिकारियों की इस प्रारंभिक जांच के मुकाबले सीबीआई (CBI) जैसी पेशेवर, एकीकृत और वित्तीय मामलों की विशेषज्ञ एजेंसी द्वारा की गई जांच जनता और भक्तों के बीच अधिक विश्वास पैदा करेगी।

स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत: इतने बड़े और जटिल वित्तीय व आपराधिक मामले की स्वतंत्र पुष्टि होना बेहद जरूरी है ताकि देश-विदेश के अनगिनत श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को ठेस न पहुंचे और सच पूरी तरह सामने आ सके।

बढ़ सकती है ट्रस्ट और जिम्मेदारों की मुश्किलें

सुप्रीम कोर्ट में इस जनहित याचिका के दाखिल होने के बाद अब गेंद देश की सर्वोच्च अदालत के पाले में है। यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करते हुए सीबीआई जांच के आदेश देता है या केंद्र व राज्य सरकार से जवाब तलब करता है, तो आने वाले दिनों में राम मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों और मामले से जुड़े संदिग्ध अधिकारियों की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं।

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