चिन्ताजनक है महंगी होती दवाइयां, महंगा होता इलाज

चिन्ताजनक है महंगी होती दवाइयां, महंगा होता इलाज

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने के स्वप्न के साथ आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना बार-बार दोहराई जा रही है। बड़े-बड़े बुनियादी ढांचे, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष उपलब्धियां और आर्थिक विकास के दावों के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने खड़ा हो जाता है-क्या ऐसा भारत वास्तव में विकसित कहलाएगा, जहां एक सामान्य नागरिक बीमारी के कारण कर्ज में डूबने को विवश हो जाए? जहां इलाज और दवाइयों की बढ़ती कीमतें जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करने लगें? जहां  स्वास्थ्य सेवा अधिकार नहीं, बल्कि आर्थिक सामर्थ्य का विषय बन जाए? ऐसे समय में जब महंगाई पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है, नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एन.पी.पी.ए.) द्वारा कुछ जीवनरक्षक दवाओं और टीकों की कीमतों में भारी वृद्धि की अनुमति देना गंभीर चिंता का विषय है। कैंसर की कुछ दवाओं, एंटी-टेटनस सीरम और बच्चों के आवश्यक टीकों की कीमतों में लगभग पचास प्रतिशत तक वृद्धि की स्वीकृति ने लाखों परिवारों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। यह निर्णय केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना और जनकल्याणकारी शासन की अवधारणा से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में लोग आज भी अपने इलाज का खर्च अपनी जेब से वहन करते हैं। बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं रह जाती, वह आर्थिक संकट में भी बदल जाती है। एक समय था जब कहा जाता था कि व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के कारण कर्ज में डूबता है, लेकिन आज की स्थिति यह है कि किसी गंभीर बीमारी का इलाज पूरा परिवार आर्थिक रूप से बर्बाद कर सकता है। कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोग या अन्य जटिल बीमारियों का उपचार लाखों रुपये की मांग करता है। ऐसे में यदि जीवनरक्षक दवाइयों की कीमतें भी लगातार बढ़ती रहें तो गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य सेवा लगभग असंभव हो जाएगी। एन.पी.पी.ए. ने दवाओं की कीमत बढ़ाने के पीछे उत्पादन लागत में वृद्धि और बाजार में संभावित कमी का तर्क दिया है। उनका कहना है कि यदि दवा कंपनियां लागत भी नहीं निकाल पाएंगी तो वे उत्पादन बंद कर सकती हैं, जिससे मरीजों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं होंगी। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। किसी भी उद्योग को जीवित रहने के लिए उचित लाभ आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं को सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है? क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में लाभ कमाने की सीमा और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया जाना चाहिए? लोगऔर समाज

स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की दो मूलभूत आवश्यकताएं हैं। दुर्भाग्य से भारत में इन दोनों क्षेत्रों में व्यवसायीकरण का प्रभाव लगातार बढ़ता गया है। निजी अस्पतालों की बढ़ती फीस, महंगे परीक्षण, अनावश्यक जांचें, चिकित्सा उपकरणों का भारी खर्च और अब दवाइयों की बढ़ती कीमतें मिलकर आम नागरिक को असहाय बना रही हैं। चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे सेवा के बजाय उद्योग में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। अस्पताल स्वास्थ्य केंद्र कम और कॉरपोरेट प्रतिष्ठान अधिक प्रतीत होने लगे हैं। रोगी अब मरीज नहीं, बल्कि ग्राहक की तरह देखा जाने लगा है। यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि सामाजिक विभाजन को भी गहरा करती है। आज भी देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मुख्यतः उन्हीं लोगों को उपलब्ध हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है। गरीब व्यक्ति सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों, सीमित संसाधनों और अपर्याप्त सुविधाओं के भरोसे है। अमीर व्यक्ति अत्याधुनिक अस्पतालों और महंगे उपचारों का लाभ उठा सकता है। क्या यही सामाजिक न्याय है? क्या यही वह भारत है जिसकी कल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी? भौगोलिकसंदर्भ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनेक जनहितकारी योजनाएं लागू हुई हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजना ने लाखों लोगों को राहत भी प्रदान की है। जन औषधि केंद्रों की स्थापना ने सस्ती दवाइयों की उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास किया है। लेकिन इसके बावजूद  स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त व्यापक विसंगतियां अभी भी बनी हुई हैं। यदि दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहें और निजी  स्वास्थ्य सेवाएं अनियंत्रित होती जाएं, तो इन योजनाओं का प्रभाव सीमित हो जाएगा। वास्तविक चुनौती यह है कि स्वास्थ्य को बाजार की शक्तियों के हवाले छोड़ने के बजाय उसे जनकल्याण के केंद्र में रखा जाए। सरकार का दायित्व केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक नागरिक को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर विशेष नियंत्रण होना चाहिए। सरकारी  अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। दवा खरीद प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। आवश्यक दवाओं के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार विशेष सहायता और सब्सिडी भी दे सकती है, ताकि लागत बढ़ने का पूरा बोझ मरीजों पर न पड़े।

इसके साथ ही स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा और व्यापक होना चाहिए। अनेक गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार ऐसे हैं जो किसी भी बीमा सुरक्षा से वंचित हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में वे अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा देते हैं। स्वास्थ्य बीमा केवल अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित न रहे, बल्कि आवश्यक दवाओं और दीर्घकालिक उपचार को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि सरकार समय-समय पर दवा कंपनियों की लागत संरचना और मूल्य निर्धारण की स्वतंत्र समीक्षा कराए। यदि वास्तव में लागत बढ़ी है तो उसका प्रमाण सार्वजनिक होना चाहिए। पारदर्शिता से जनता का विश्वास भी बढ़ेगा और अनावश्यक मूल्यवृद्धि पर भी रोक लगेगी। स्वास्थ्य नीति का मूल उद्देश्य कंपनियों के लाभ और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। अस्‍पतालव उपचार केंद्र

वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल ऊंची इमारतों, तेज रफ्तार सड़कों और बढ़ती जीडीपी से नहीं बनेगा। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि वहां का सबसे गरीब नागरिक कितना सुरक्षित, शिक्षित और स्वस्थ है। यदि एक किसान, मजदूर, कर्मचारी या निम्न आय वर्ग का व्यक्ति बीमारी के समय सम्मानपूर्वक इलाज प्राप्त नहीं कर सकता, तो विकास के दावे अधूरे रह जाएंगे। आज आवश्यकता केवल दवाइयों की कीमतों पर बहस करने की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की समग्र समीक्षा करने की है। यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि मौलिक मानवीय अधिकार है। जिस राष्ट्र में नागरिकों को स्वस्थ जीवन का अवसर नहीं मिलता, वहां विकास की चमक भी फीकी पड़ जाती है। समय आ गया है कि सरकार, नीति-निर्माता, चिकित्सा जगत और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि स्वास्थ्य सेवा लाभ कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का सशक्त उपकरण बने। अन्यथा विकसित भारत का सपना केवल आंकड़ों में चमकेगा, जबकि आम आदमी बीमारी, कर्ज और असहायता के अंधकार में संघर्ष करता रहेगा। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के सामने यही सबसे बड़ी नैतिक और मानवीय चुनौती है, जिसका समाधान आज ही तलाशना होगा।


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