गुमनाम पार्टी में क्यों शामिल हुए TMC के नामी सांसद? दलबदल विरोधी नारे वाला दल क्यों बना तृणमूल के बागियों का नया ठिकाना?

गुमनाम पार्टी में क्यों शामिल हुए TMC के नामी सांसद? दलबदल विरोधी नारे वाला दल क्यों बना तृणमूल के बागियों का नया ठिकाना?

तृणमूल कांग्रेस में उठी बगावत ने राष्ट्रीय  राजनीति को ऐसा मोड़ दे दिया है जिसकी गूंज आने वाले महीनों तक सुनाई दे सकती है। हम आपको बता दें कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने अचानक एक लगभग गुमनाम दल नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई में विलय का ऐलान कर दिया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से अलग समूह के तौर पर मान्यता तथा सदन में अलग बैठने की मांग कर डाली। इस घटनाक्रम ने केवल बंगाल की राजनीति को नहीं हिलाया, बल्कि दलबदल कानून, विपक्ष की एकजुटता और संसद की शक्ति संतुलन की बहस को भी फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस एनसीपीआई में यह विलय हुआ है, उसका अब तक का राजनीतिक अस्तित्व लगभग नगण्य रहा है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस दल ने चार उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी, लेकिन आखिरकार तीन सीटों पर ही चुनाव लड़ पाया। पार्टी के उम्मीदवारों का प्रदर्शन इतना कमजोर रहा कि वे कई जगह नोटा से थोड़ा ही आगे निकल सके। त्रिपुरा की चावमानु सीट पर पार्टी उम्मीदवार बरजेदा त्रिपुरा को केवल 536 वोट मिले, जबकि नोटा को 500 वोट प्राप्त हुए। कैलाशहर सीट पर पार्टी को मात्र 286 वोट मिले। कुल मिलाकर दो सीटों पर एनसीपीआई को सिर्फ 822 वोट हासिल हुए थे।

खास बात यह भी है कि इस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘पेन की निब’ है और इसने नारा दिया था, “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दलबदलुओं को नकारें।” लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए कि अब वही दल देश के सबसे चर्चित दलबदल का मंच बन गया है। वैसे इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल नाराजगी नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक रणनीति दिखाई दे रही है। बागी सांसदों का मकसद सीधे भाजपा में जाना नहीं, बल्कि पहले एक अलग राजनीतिक पहचान बनाकर दलबदल कानून से बचना माना जा रहा है। हम आपको बता दें कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी दल के दो तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से राहत मिल सकती है। इसी कानूनी रास्ते का इस्तेमाल करते हुए बागी गुट खुद को “असली तृणमूल” साबित करने की जमीन तैयार कर रहा है। 

तृणमूल के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने साफ कहा है कि अभी उन्होंने एनसीपीआई में विलय किया है, लेकिन संसद का अगला सत्र शुरू होने पर वह तृणमूल नाम और पहचान पर दावा करेंगे। उनका कहना है कि दो तिहाई सांसद उनके साथ हैं, इसलिए वास्तविक राजनीतिक अधिकार भी उसी गुट के पास होना चाहिए। दूसरी ओर, टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट वाले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल विधायी दल का टूटना पर्याप्त नहीं होता, मूल  राजनीतिक दल का विलय भी जरूरी है।

देखा जाये तो यही वह बिंदु है जहां यह लड़ाई केवल संख्या की नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक व्याख्या की बन जाती है। तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि पार्टी सर्वोपरि है, सांसद नहीं। जबकि बागी गुट संख्या बल के आधार पर वैधता चाहता है। इस टकराव का अंतिम फैसला अब अदालत और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

हम आपको यह भी बता दें कि इस घटनाक्रम की तुलना 2016 के अरुणाचल प्रदेश संकट से भी की जा रही है। तब कांग्रेस के अधिकांश विधायक पहले पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में गए और बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। उसी रास्ते ने भाजपा को पूर्वोत्तर में पहली पूर्ण सरकार दी थी। अब तृणमूल के भीतर भी वैसी ही पटकथा दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति पर लगा है। शब्दकोशऔर विश्वकोश

 राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा झटका माना जाएगा। बंगाल में भाजपा लगातार तृणमूल कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है और अब यदि लोकसभा में पार्टी का बड़ा हिस्सा अलग खड़ा हो जाता है, तो विपक्षी  राजनीति में ममता की राष्ट्रीय भूमिका कमजोर पड़ सकती है। खासकर ऐसे समय में जब विपक्षी एकता की राजनीति पहले ही बिखराव का शिकार है।

दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह घटनाक्रम अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ लेकर आ सकता है। बागी सांसदों ने पहले ही राजग को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। यदि यह समीकरण आगे बढ़ता है, तो संसद में सत्ता पक्ष की स्थिति और मजबूत हो सकती है।

सबसे तीखी चोट हालांकि राजनीति की नैतिकता पर पड़ती दिखाई देती है। जिस दल ने दलबदलुओं को नकारने का नारा दिया था, वही अब दलबदल की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया है। यह भारतीय राजनीति का वह चेहरा है, जहां विचारधारा से ज्यादा महत्व संख्या, सत्ता और कानूनी चालों का रह गया है। छोटे दल अब केवल चुनाव लड़ने के मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्जन्म के औजार बनते जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की यह टूटन आने वाले दिनों में केवल बंगाल की राजनीति नहीं बदलेगी, बल्कि यह तय करेगी कि देश में दलबदल कानून की असली ताकत कितनी बची है। संसद, अदालत और चुनाव आयोग, तीनों की अग्निपरीक्षा अब शुरू हो चुकी है। उधर, एनसीपीआई पार्टी के कार्यालय के बाहर इन दिनों कौतूहल के साथ लोग इकट्ठा हो रहे हैं। आसपास के लोगों का तो यहां तक कहना है कि हमें तो पता ही नहीं था कि यहां से कोई पार्टी चल रही है। राजनीति


-नीरज कुमार दुबे


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