सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए

सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए

बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह केवल सत्ता संचालन का मामला नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना दिया। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा को मिली अभूतपूर्व विजय से बिहार का महत्व और भी बढ़ चुका है, क्योंकि पश्चिम, उत्तर, मध्य भारत के बाद पूर्वी भारत में भाजपा ने गजब का विस्तार किया है। इसे बरकरार रखने में बिहार की अहम भूमिका होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार में भाजपा अब “सहयोगी दल” नहीं बल्कि “मुख्य धुरी” बनना चाहती है। यही वजह है कि वह एनडीए के सामाजिक समीकरणों को फिर से पुनर्गठित कर रहा है। खासकर नीतीश युग से सम्राट युग की ओर नियंत्रित लेकिन सधे हुए कदमों से वह कदमताल भर रही है, जिसका सारा श्रेय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साहस, समर्पण, और सहृदयता को जाता है, जिससे मोदी-शाह का काम आसान हुआ।

देखा जाए तो भाजपा आम चुनाव 2029 की राजनीति की नींव अभी से रखी जा रही है। इसके लिए नीतीश सरकार के जातीय समीकरण को अक्षुण्ण रखते हुए सामाजिक न्याय और हिंदुत्व को नई धार दे चुकी है। इससे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 में भी बहुत फायदा मिलेगा। वहीं, पूर्वी भारत के लिए भविष्य की चुनौतियों से निपटने और खासकर ग्रेटर बंगलादेश के सपनों को नेस्तनाबूद करने की अंदरूनी तैयारी भी भाजपा ने तेज कर दी है, जिसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा असम, के अलावा त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि की भी अहम भूमिका रहेगी। 

लिहाजा, बिहार में सम्राट सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के अहम मायने इस प्रकार हैं- 

पहला, भाजपा का “नया बिहार नेतृत्व” स्थापित करने की कोशिश और उसके निमित्त जारी जद्दोजहद

युवा और कर्मठ राजनेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बिहार में “पोस्ट-नीतीश युग” की शुरुआत का संकेत दिया है, लेकिन अब मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए पार्टी नेतृत्व द्वारा यह संदेश दिया गया है कि पार्टी बिहार में अपना स्वतंत्र नेतृत्व खड़ा कर रही है। इसमें नए और आक्रामक राजनीतिक चेहरों को जगह दी गई है। विभागों का बंटवारा भी काफी सूझबूझ से किया गया है। इसका श्रेय टीम मोदी-शाह-चौधरी को ही जाता है।

दूसरा, गोविंदाचार्य के यूपी सोशल इंजीनियरिंग का बिहार में अबतक का बड़ा प्रयोग

सम्राट कैबिनेट के गठन में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ओबीसी, ईबीसी, दलित, महादलित, सवर्ण, निषाद, कुशवाहा, पासवान और क्षेत्रीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया है। वहीं, अकस्मात लाए हुए यूजीसी बिल के साइड इफेक्ट्स से भी एनडीए को बचाने की पुरजोर कोशिश दिखी। लिहाजा, इसे भाजपा-जदयू गठबंधन की संयुक्त “सामाजिक समीकरण साधो” रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। जानकारों के मुताबिक, विशेष रूप से, ओबीसी और ईबीसी वर्ग को बड़ा प्रतिनिधित्व के दृष्टिगत अतिपिछड़ा वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश के साथ साथ दलित-पासवान समीकरण को एनडीए में स्थिर रखने का प्रयास करते हुए सीमांचल और मिथिलांचल को राजनीतिक संदेश दिया गया है। इससे नए चेहरों की भी किस्मत खुली।

तीसरा, जदयू और भाजपा के बीच “50-50 का शक्ति संतुलन” ताकि परस्पर सहयोग और मजबूत हो

रिपोर्टों के अनुसार भाजपा और जदयू के बीच लगभग बराबरी का फार्मूला अपनाया गया। इससे यह संकेत गया कि गठबंधन में जदयू अभी भी सम्मानजनक स्थिति में है, जबकि भाजपा नेतृत्वकारी भूमिका में आगे बढ़ रही है। आपको बता दें कि भाजपा और जदयू की दोस्ती दोनों दलों के लिए बहुत सुखदायी समझी जाती है। तभी तो एक नहीं बल्कि दो-दो बार नीतीश कुमार एनडीए से बाहर गए, लेकिन भाजपा ने उन्हें बार-बार मौका देकर नीतीश कुमार की इज्जत बनाए रखी। वहीं, उनकी पसंद का मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बनाकर, भाजपा में ही नीतीश कुमार पैदा करने की अहम चाल चली, जिसका फायदा क्रमबद्ध रूप से समझ में आएगा।


चौथा, भरोसेमंद राजनीतिक मित्र नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण कोशिश

पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को मंत्रिमंडल में बतौर स्वास्थ्य मंत्री शामिल किया जाना बेहद प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है। इसके लिए पार्टी ने अपने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय तक को दरकिनार करना मुनासिब समझी। इससे जदयू के भीतर उत्तराधिकार राजनीति को संस्थागत रूप देने का संकेत मिलता है। इससे भाजपा का लवकुश समीकरण काफी मजबूत होगा। इसप्रकार यह कदम तीन संदेश देता है: एक, जदयू का भविष्य “परिवार-केंद्रित नेतृत्व” की ओर जा सकता है। दो, भाजपा फिलहाल नीतीश परिवार के साथ टकराव नहीं चाहती। और तीसरा, गठबंधन में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश है।

पांचवां, पश्चिम बंगाल चुनाव की अभूतपूर्व जीत के बाद पूर्वी भारत में एनडीए का शक्ति प्रदर्शन

गांधी मैदान, पटना में बड़े आयोजन और शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व की अहम मौजूदगी यह दर्शाती है कि भाजपा बिहार को पूर्वी भारत की राजनीति का केंद्रीय मैदान बना रही है। यह संदेश विपक्ष, खासकर तेजस्वी यादव और महागठबंधन को दिया गया कि एनडीए अभी भी संगठनात्मक और चुनावी रूप से मजबूत है। इसलिए इंडिया गठबंधन अपना कुनबा संभाले न कि एनडीए गठबंधन पर बक्र दृष्टि रखे। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है।

छठा, सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में युवा और नए चेहरों पर रचनात्मक दांव

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी कैबिनेट में कई नए चेहरों को मंत्री बनाकर भाजपा और जदयू दोनों के मिशन “जनरेशन शिफ्ट” का संकेत दिया है। इससे एंटी-इंकम्बेंसी कम करने और युवा वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश दिखती है। ऐसा इसलिए कि वर्तमान राजनीति में किसानों, मजदूरों, कारीगरों के साथ साथ महिलाओं और युवाओं की भूमिका बढ़ी है। आजकल युवा ड्राइविंग फोर्स की तरह निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। पूर्वी भारत में भाजपा का आधार जागरूक युवा ही हैं। इसलिए भाजपा उनके सपनों को पूरा करने में जुटी रहती है। यदि ऐसा स्वप्न साकार होता है तो इससे न केवल पूर्वी बिहार, बल्कि मध्य बिहार, उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार में भी भाजपा को मजबूती मिलेगी।

सातवां, लकीर की फकीर वाली सियासत में निमग्न  महामूर्ख विपक्ष के लिए भाजपा की जमीनी रणनीति बनी अहम चुनौती

भाजपा के मौजूदा विस्तार से विपक्ष की जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति को करारा जवाब देने की रणनीति भी दिखाई देती है। इसका सारा श्रेय नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को जाता है। लिहाजा अब उनके वफादार लोग और पार्टी की टीम के खास लोग भाजपा को मजबूत करेंगे। खासकर, विपक्ष के हर राजनीतिक दांव पर पलटवार करते हुए। इससे भाजपा केवल हिंदुत्व ही नहीं, बल्कि “हिंदुत्व, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विकास” मॉडल पर आगे बढ़ती दिख रही है। इसके लिए भाजपा का प्रयास  सराहनीय है, स्तुत्य है। इसका दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए।

आठवां, चुस्त-दुरुस्त जातीय समीकरण

सम्राट चौधरी के कैबिनेट विस्तार में भाजपा के 15 (मुख्यमंत्री सहित 16), जेडीयू के 13 (दो उपमुख्यमंत्री सहित 15), लोजपा रामविलास के 2, हम और आरएलएम के 1-1 नेता ने मंत्रीपद की शपथ ली। इनमें भाजपा से 5 और जेडीयू से 3 नए चेहरों ने शपथ ली, जिनमें पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, इंजीनियर कुमार शैलेंद्र, मिथिलेश तिवारी, रामचंद्र पासवान, अरुण शंकर, नंदर किशोर राम, बुलो मंडल और श्वेता गुप्ता आदि का नाम शामिल है। बिहार सरकार की कैबिनेट में अब पांच महिला मंत्री हैं, जिनमें जदयू की तीन नेता शामिल हैं।

देखिए पूरी सूची, जातीय विवरण सहित:- 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि उनके मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1.राम कृपाल यादव - ओबीसी, 2.केदार गुप्ता - कानू/ ईबीसी 3.नीतीश मिश्रा - ब्राह्मण, 4. मिथिलेश तिवारी - ब्राह्मण, 5. रमा निषाद - ईबीसी / मल्लाह , 6. विजय कुमार सिन्हा - भूमिहार ब्राह्मण, 7. दिलीप जायसवाल - ईबीसी, 8. प्रमोद चंद्रवंशी - ईबीसी, 9. लखेन्द्र पासवान - दलित, 10. संजय टाइगर- राजपूत, 11. इंजीनियर कुमार शैलेन्द्र- भूमिहार ब्राह्मण, 12. नंद किशोर राम- दलित, 13. रामचंद्र प्रसाद - वैश्य/ ओबीसी, 14. अरुण शंकर प्रसाद - सूढ़ी वैश्य/ ओबीसी, 15. श्रेयसी सिंह- राजपूत।

वहीं, जनतादल यूनाइटेड (जदयू) के 2 उपमुख्यमंत्री क्रमशः विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1. निशांत कुमार- कुर्मी/ ओबीसी, 2. श्रवण कुमार - कुर्मी/ ओबीसी, 3. अशोक चौधरी- दलित, 4. लेसी सिंह- राजपूत,  5. मदन सहनी- मल्लाह/ ईबीसी, 6. सुनील कुमार- दलित, 7. जमा खान- अल्पसंख्यक, 8. भगवान सिंह कुशवाहा- कोइरी/ ओबीसी, 9. शीला मंडल- धानुक / ईबीसी, 10. दामोदर राउत - धानुक/ ईबीसी, 11. बुलो मंडल- गंगोता/ ईबीसी, 12. रत्नेश सदा- दलित, 13. श्वेता गुप्ता- बनिया।

लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) यानी लोजपा (आर) से निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:-1. संजय पासवान- दलित 2. संजय सिंह - राजपूत। वहीं, हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा यानी हम से निम्नलिखित नेता को शामिल किया गया है:-1. संतोष मांझी- दलित। वहीं,  जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा (रालोमो) से निम्नलिखित नेताको शामिल किया गया है:-1. दीपक प्रकाश - कुशवाहा। इस नए मंत्रिमंडल में कोसी और सीमांचल को भी तवज्जो दी गई है, जो पूर्वी बिहार का अभिन्न अंग है।


- कमलेश पांडेय


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