अंगदान बढ़ाने को मध्य प्रदेश का रास्ता अपनाएं

अंगदान बढ़ाने को मध्य प्रदेश का रास्ता अपनाएं

मध्य प्रदेश सरकार ने अंगदान करने वालों को सम्मानित करने के साथ उनके परिवार को आयुष्मान भारत योजना का लाभ देने जा रही है। इसमें अंगदान करने वाले के परिवार को प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का निःशुल्क इलाज मिलेगा। जागरूकता बढ़ाने के लिए 18 लाख रुपये की डॉक्यूमेंट्री बनाई जा रही है। राज्य का स्टेट आर्गन एवं टिश्यू ट्रांसप्लांट पोर्टल भी तैयार हो रहा है। मध्य प्रदेश चिकित्सा विभाग के संचालक डॉ. एके श्रीवास्तव ने बताया कि शीघ्र ही इस संबंध में शासन स्तर पर निर्णय हो जाएगा। निश्चय ही यह निर्णय भारत की महर्षि दधीचि की देहदान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा। मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित करेगा। वैसे जो कार्य मध्य प्रदेश सरकार करने जा रही है, उसे प्रत्येक प्रदेश को लागू करना चाहिए। अच्छा हो कि ये केंद्र की ओर से लागू हो। इस कार्य के लिए जागरूकता अभियान भी चलाने की जरूरत है। इसके लिए लोगों को प्रेरित करने के साथ प्रोत्साहित भी करना होगा।

भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख से ज्यादा लोग वक्त पर अंग न मिलने से मौत का शिकार हो जाते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनमें से दो लाख के आसपास लोगों की मौत लिवर नहीं मिलने की वजह से होती है। इन मरने वालो में अधिकतर वे लोग होते हैं जो पैसा देकर अंग नहीं खरीद सकते। पैसे वाले तो मन मांगा मोल देकर अंग खरीद लेते हैं। इसी कारण मानव अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है। भारत  में प्रतिवर्ष दस लाख व्यक्तियों में अंगदान करने वालों की संख्या 0.16 है। विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड और जर्मनी में यह संख्या 10 से 30 के मध्य है। हमारे देश में इस संख्या के कम होने के कारण हैं- सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह। कई देशों में अंगदान ऐच्छिक न होकर अनिवार्य है। भारत में ऐसा कर पाना संभव नहीं है, लेकिन जागरूकता पैदाकर इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है।

लोगों में अंधविश्वास है कि यदि मृत व्यक्ति की आंखों को दान दिया जाता है तो उसे मरने के उपरांत स्वर्ग नहीं मिलता या अगले जन्म में वह आंख या उस अंग के बिना पैदा होगा, जबकि अंगों को शरीर से निकालने से परंपरागत अंत्येष्टि क्रिया या दफन क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आती। इससे शरीर के रंग-रूप में भी कोई परिवर्तन नहीं होता।अपने अंगों को मृत प्राय: रोगियों को बहुमूल्य उपहार के रूप में दान देकर अपनी मृत्यु को जीवन समान सार्थक बनाया जा सकता है।


एक मृत व्यक्ति के अंगदान से नौ लोगों को नया जीवन मिल सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में 1,04999 पुरुष, महिला और बच्चे आज भी इस इंतज़ार में हैं कि कोई अंगदान करेगा और वे अपना जीवन जी सकेंगे। राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में अकेले किडनी के जरूरतमंद व्यक्ति ही 88551 है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख मौतें सड़क हादसों से होती हैं। वर्ष 2022 में ही 168491 मौत हुईं। इसका मतलब औसतन हर रोज सड़कों पर 1000 से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं और 400 से ज्यादा लोग दम तोड़ देते हैं।


इनमें सबसे पहले मस्तिष्क पूरी तरह से कार्य करना बंद कर देता है, ऐसा शरीर अंगदान के लिए उपयुक्त होता है। फिर भी बमुश्किल दो-तीन प्रतिशत भाग्यशाली लोगों को नए अंग मिलते हैं। हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी, आंत, पैंक्रियाज ऐसे अंग हैं, जो मृत व्यक्ति के परिजनों द्वारा दान किए जा सकते हैं। आंख का कॉर्निया, हड्‌डी, त्वचा, नस, मांसपेशियां, टेंडन, लिगामेंट, कार्टिलेज, हृदय वाल्व भी मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति के काम आ सकते हैं। जीवित व्यक्ति एक पूरी किडनी व लिवर का कुछ हिस्सा दान में दे सकता है। शेष एक किडनी से दानदाता का जीवन व्यतीत हो सकता है। लिवर समय के साथ बढ़ जाता है और पुन: अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है इसलिए दाता को किसी प्रकार की कोई दिक़्क़त नहीं होती है।


भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं महान संस्कृति है। दान, धर्म एवं उच्च संस्कार प्राचीन काल से ही हमारे समाज में वरिष्ठ स्थान रखते रहे हैं। महर्षि दधीचि ने दान की पराकाष्ठा का उदाहरण समाज के समक्ष रखा। वह भारतीय संस्कृति के प्रथम अंगदानी कहे जाते हैं। देवता और दानव में युद्ध चल रहा था! दानव देवताओं पर भारी पड़ रहे थे। देवताओं को समझ नहीं आ रहा था कि युद्ध में कैसे विजय पाई जाए। इसके लिए वे ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने सुझाव दिया कि महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से दानवों को पराजित किया जा सकता है। देवता महर्षि दधीचि के पास गए। याचना की। महर्षि दधीचि द्वारा दी गई अस्थियों से बने वज्र से राक्षास ब्रजासुर का बद्ध हुआ। दानव पराजित हुए।


आर्यव्रत की हजारों साल पुरानी देहदान और अंगदान की इस परंपरा में आज भी लोगों की रुचि नहीं है। मुझे याद है कि लगभग 40 साल पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर के स्टेडियम में खेल प्रतियोगिता के दौरान भाला लगने से एक कर्मचारी घायल हो गया था। उसे खून की जरूरत थी। कहे जाने पर भी उसके परिवारजनों ने खून नहीं दिया था। उसकी मदद के लिए स्टेडियम के खिलाड़ी आगे आये। उनके रक्त देने से कर्मचारी की जान बची। अच्छा यह है कि अब रक्तदान के प्रति तो लोगों में जागरूकता बढ़ी है, किंतु अंगदान के प्रति अभी चेतना नही है। अंगदान के प्रेरित करने वाले चिकित्सकों की भी कमी है। यदि बड़े और सरकारी अस्पताल के चिकित्सक मृतक के परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित करने लगे तो बड़ा काम हो सकता है। 


हालांकि हेल्थ प्रोफेश्नल आमतौर पर अंगदान के विषय पर मृतक के परिजनों से बात करने में अटपटा महसूस करते हैं। नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ समीरन नंदी ने डीडब्लू को बताया, "डॉक्टर मृतक के अंगों को दान देने के बारे में पूछने से कतराते हैं, कोई इस बारे में प्रोत्साहन भी नहीं है और बदले की कार्रवाई का डर भी रहता है।" एक बात ओर अंगदान करने के इच्छुक लोग बढ़ भी जाएं तो सभी अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण से जुड़ी तमाम प्रक्रियाओं के लिए जरूरी साजो सामान या उपकरण मौजूद नहीं हैं।


भारत में सिर्फ 250 अस्पताल ही नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (नोटो) से पंजीकृत हैं। ये संगठन देश के अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम का समन्वय करता है। यानी देश में प्रत्येक 43 लाख नागरिकों के लिए, तमाम सुविधाओं और उपकरणों वाला सिर्फ एक अस्पताल है। भारत के देहाती इलाकों में तो ट्रांसप्लांट सेंटर कमोबेश हैं भी नहीं। अंगदान की प्रक्रिया बहुत लाभकर है पर जिस तेजी से बढ़नी चाहिए, उस तेजी से नहीं अंगदान के नाम पर आंख देना ही शुरू हुआ है। यह भी न के बराबर। जबकि मानव कल्याण के लिये अंगदान का प्रचार प्रसार बहुत जरूरी है। रक्तदान में जरूर तेजी आई है।


प्रत्येक वर्ष तीन अगस्त को अंगदान दिवस मनाया जाता है। एक दिवस में इस महत्वपूर्ण कार्य की इतिश्री कर दी जाती है। जबकि प्रत्येक पल अंगदान के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। अंगदान के लिए जनजागरण की जरूरत है। स्कूली शिक्षा से छात्रों में जनजागरण के लिए जागरूकता विकसित की जानी चाहिए। अन्य अभियानों की तरह अंगदान के लिए भी अभियान चलाने की जरूरत है। इसके लिए विभिन्न   धर्मगुरूओं से संपर्क कर उनसे अनुरोध किया जाए कि वह अंगदान के लिए अपने समर्थकों को प्रेरित करें। मध्य प्रदेश की तरह अंगदान करने वालों परिवारों के सममानित करने के साथ उन्हें प्रोत्साहित करने आयुष्मान योजना जैसी सरकारी योजना का लाभ दिलाने की भी जरूरत है। 


  


वैसे हाल में अंगदान के लिए कई अच्छे स्लोगन सामने आए हैं। मरने के बाद भी यदि दुनिया की खूबसूरती देखते रहना चाहते हों तो आंखे दान करो। मरने के बाद भी दिल की धड़कन महसूस करनी हों, तो दिल दान करों। इस तरह के और रोचक नारे और स्लोगन बनाकर बढ़िया कर प्रचार करने महर्षि दधीचि की देहदान की परम्परा को ओर आगे बढ़ाया जा सकता है और ज्यादा लोगों की जान बचायी जा सकती हैं।


- अशोक मधुप


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