UN चीफ ने तेल कंपनियों को झूठ बोलने पर फटकारा:बोले- इंसानों के रहने लायक नहीं बचेगी धरती, यहां रहना मौत की सजा जैसा होगा

 UN चीफ ने तेल कंपनियों को झूठ बोलने पर फटकारा:बोले- इंसानों के रहने लायक नहीं बचेगी धरती, यहां रहना मौत की सजा जैसा होगा

संयुक्त राष्ट्र संघ यानी UN के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने बुधवार को दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों पर ग्लोबल वार्मिंग को लेकर डांट लगाई है। दावोस में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम में बोलते हुए गुटरेस ने कहा- कई बड़ी तेल कंपनियों को पता था कि ज्यादा तेल की खपत से दुनिया का क्या हाल हो सकता है। उसके बाद भी दशकों तक इस बात को छिपाए रखा गया।

उन्होंने दुनिया को चेतावनी दी कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पृथ्वी का बड़ा हिस्सा इंसानों के रहने लायक नहीं बचेगा। गरीब और पिछड़े लोगों के लिए यहां रहना मौत की सजा जैसा होगा।

अमेरिकी कंपनी के खुलासे पर बोल रहे थे गुटेरेस

दरअसल एंटोनियो गुटरेस दुनिया की बड़ी तेल कंपनी एक्सोन मोबिल के खुलासे पर यह बात कह रहे थे। जो पिछले साल दिसंबर में किया गया था। जिसमें बताया गया था एक्सोन कंपनी के वैज्ञानिक को पहले ही पता था कि जिस तरह से तेल कंपनियां तेल का उत्पादन कर रही हैं।

इससे धरती का तापमान बढ़ेगा और इसके ज्यादा इस्तेमाल से दुनिया पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडराएगा। हालांकि, सब कुछ पता होने के बाद भी कंपनी कहती रही थी कि इससे पृथ्वी को कोई नुकसान नहीं होगा।

एंटोनियो गुटेरेस ने इन कंपनियों को लेकर कहा कि इनकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। 1970 में सब कुछ पता होने के बाद भी इन्होंने धरती को जलने के लिए छोड़ दिया।

तेल कंपनियों की तंबाकू कंपनियों से तुलना की

एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि 1998 में जिस तरह तंबाकू कंपनियों को लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करने के लिए हर्जाना देना पड़ा था। ठीक उसी तरह अब तेल कंपनियों से भी हर्जाना वसूला जाना चाहिए। दरअसल तेल कंपनियों की तरह ही दुनिया की बड़ी तंबाकू कंपनियों ने भी उसके मानव शरीर पर होने वाले बुरे असर की जानकारी छिपाई थी। जिसके चलते उसे 20 लाख करोड़ का मुआवजा देना पड़ा था।

दुनिया भर का तापमान पिछले 150 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। लेकिन इस सदी के अंत तक इसके 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है। ऊपर से धरती के दक्षिण ध्रुव के ऊपर ओजोन परत में हर साल बढ़ रहा छेद अंटार्कटिका से भी बड़े आकार का हो गया है। इसका भी ग्लोबल टेंपरेचर पर असर पड़ना तय है।

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