दूर कहीं बादलों के पास , नदी के किनारे , बारिश की बूंदों से खुद का पता पूछते हुए..

दूर कहीं बादलों के पास , नदी के किनारे , बारिश की बूंदों से खुद का पता पूछते हुए..

मैं बहुत ज्यादा आध्यात्मिक नही हूँ पर किसी भी धर्मस्थल या धर्म के प्रतीक की तरफ नज़र जाते ही या उसके सामने से गुज़रते ही सम्मान और श्रद्धा से सर जरूर झुकाता हूँ , कैंची धाम में , दूर इन जंगलों में , नदी की कलकल के बीच मुझे सुकून मिलता है ।

अब तक के जीवन मे दूसरी बार ये संयोगवश ही सुयोग बना कि अपने जन्मदिन पर मैं किसी ऐसी जगह पर रहा जहां शक्ति विश्वास की , आस्था की , आध्यात्म की , प्रकृति की महसूस की मैंने । हालांकि मैं ये मानता हूं मेरे जीवन की गति को मेरे अपने कर्म ही सुनिश्चत करेंगे पर गति बनी रहे , जीवन चलता रहे मेरा , मेरे अपनो का इस हेतु प्रार्थना की , लोभवश ही सही वहीं पर मनन किया , मनुहार की ।

अब आते हैं यात्रा के पहलुओं पर , बारिश की खबरों ने थोड़ा पशोपेश में डाल रखा था , फोरकास्ट , जानकारों की सबकी यही राय थी कि फिलहाल 10- 15 दिन पहाड़ों की यात्रा ना की जाए पर मेरा मन था कि अपने जन्मदिन पर शहर की चिल्ल पों से दूर कहीं प्रकृति के सानिध्य में बाबा का आशीर्वाद लेकर विचरण करूँ मैं , आखिर में मन की सुनी गई , साथ दिया Vipin Srivastava जी ने और हम निकल पड़े झोला झंडा उठाकर , रास्ते भर बारिश की बौछारों ने हमारा इस्तकबाल किया और पहाड़ों के इलाके में पहुंचते ही आस पास से ही गुज़र से रहे बादलों ने हमारा प्रणाम लिया । 10 सेकेंड के अंतर से एक पत्थर के ऊपर से गिरने का नज़ारा भी देखा पलट कर , 10 सेकेंड पहले गुज़रती हमारी कार वहां से तो नज़ारे के साथ साथ तारे भी दिख जाते हमे दिन में ही ।

हमारा प्लान ये था कि कैंची धाम के आस पास हम रात रुकेंगे और अगले दिन किसी ऑफबीट लोकेशन पर खटोला बिछाया जाएगा , सोचा था बारिश का माहौल है सो कम ही लोग होंगे धाम में पर सारी सोच विचार धरी रह गयी , जबरदस्त भीड़ थी कैंची धाम में , आस पास के सभी रुकने के स्थान लगभग फुल और साथ ही में कहीं भी लाइट नही । खैर हम लोगों ने दर्शन किये बारिश के बीच ही और कुछ खोजबीन कर भीमताल और मुक्तेश्वर के बीच मे अकसोरा जंगल के बीच गोला नदी के किनारे एक कैम्प साइट में बुकिंग कर ली , 7 बजे शाम के आस पास हम पहुंचे वहां , घनघोर अंधियारा और नदी के तेज बहाव की कल कल ने हमारा स्वागत किया ।

सोचा था अगला दिन और आगे बढ़कर मुक्तेश्वर के आस पास रुकेंगे पर बारिश थमी ही नही और ना ही थमने के आसार दिखे आने वाले दिनों में , साथ ही आस पास के सारे इलाके में बिजली भी गुल थी सो हमने अपना प्लान स्थगित कर अगले दिन वापसी कर ली । रास्ते भर बारिश का आनंद लिया और घर आ गए।

अब आते हैं कैम्प की सुविधाओं और असुविधाओं के बीच सामंजस्य बनाने की तरफ । हम जहां रुके थे उसका किराया था 1500 रुपये प्रति व्यक्ति , खाना नाश्ता इंक्लूडेड , हमारे ड्राइवर साहब को मिलाकर हम तीन लोग बने 4500 के । ट्रिपल शेयरिंग में हमे टेंट दिया गया जिसकी कंडीशन अच्छी थी । बिजली सारे इलाके में नही थी और हमारे मोबाइल भी चार्ज नही थे । हमने इसके लिए बात की तो उन्होंने कुछ देर के लिए जनरेटर चलाया , इस कुछ देर को बहुत देर तक मे तब्दील करने की कोई ज़िद नही की हमने , खाना खाकर चुपचाप लेट गए , खाना भी अच्छा था । बरसात थी , जंगल था , पास में नदी थी सो कीड़े , मच्छर और शोर लाज़िमी था ये भी समझा और माना हमने भले मानसो की तरह ।

अगले दिन भी लाइट तो नही ही थी और हमारे फोन डिस्चार्ज हो रहे थे फ़ोटो वीडियो और अति से ज्यादा कॉल्स आने के कारण , पॉवर बैंक भी बोल गया था , गीजर चल नही सकता सो पानी भी ठंडा था , जनरेटर चलाने में भी असमर्थता व्यक्त की गई स्टॉफ के द्वारा पर हमने कोई शिकायत नही की और न ही जनरेटर चलाने की ज़िद की , नाश्ता किया , देनदारी क्लियर की , स्टाफ को भेंट स्वरूप दक्षिणा दी और सम्मान से विदा हुए टाटा कर के ।

हमको वो प्रकृति के नजारे याद रहेगें और कैम्प साइट वालों को शायद हम और हमारी सामंजस्यता । कैम्प साइट का नाम निर्मित कैम्प है और गूगल पर आसानी से मिल सकता है , अच्छी जगह है , अगर प्रकृति के समीप रहने के शौकीन हैं तो रुका जा सकता है वहां ।

जय बाबा की

अभिनव ( लेखक ख़ंजर सूत्र डॉट कॉम के संपादक हैं )



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