महाराष्ट्र में गरीब आदिवासी बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं सेवानिवृत्त शिक्षक

महाराष्ट्र में गरीब आदिवासी बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं सेवानिवृत्त शिक्षक

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में सेवानिवृत्त हो चुके शिक्षक कोविड-19 महामारी के कारण बड़ी संख्या में बेरोजगार हुए गोंड आदिवासी समुदाय के लोगों के बच्चों की पढ़ने लिखने में मदद कर रहे हैं। चिकित्सकों और शिक्षकों सहित पेशेवरों के एक समूह द्वारा शुरू की गई मेक देम स्माइल परियोजना के तहत शुरुआत में की बाधा के बावजूद इनमें से 50 से अधिक आदिवासी बच्चे अब न केवल पढ़ने बल्कि लिखने में भी सक्षम हैं।


इस परियोजना से जुड़े सदस्यों ने पीटीआई-को बताया कि बच्चे अब व्यक्तिगत स्वच्छता और अनुशासन का ध्यान रखने के साथ-साथ खेल गतिविधियों में भी भाग ले रहे हैं। महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि इन आदिवासी बच्चों को मुख्यधारा में लाने और उनके गुणों की पहचान करने तथा उन्हें उसी के अनुसार तैयार करने के लिए यह परियोजना एक अच्छी पहल है। गोंड आदिवासी कुछ दशकों से औरंगाबाद में देवगिरी किले के पास स्थित मालीवाड़ा इलाके में एक बस्ती में रह रहे हैं।


इस बस्ती में लगभग 150 लोग रहते हैं जो पेड़ों की जड़ों और जड़ी बूटियों को बेचने के पारंपरिक व्यवसाय के माध्यम से अपनी आजीविका चलाते थे। इस परियोजना के लिए काम कर रहे एक स्थानीय नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ श्रीरंग देशपांडे ने कहा कि जब उनका कारोबार विफल हो गया तो उनमें से कई लोगों ने मजदूर के रूप में काम करने का फैसला किया। लेकिन महामारी के दौरान वे बेरोजगार हो गए। उन्होंने कहा हम कोविड-19 महामारी की पहली लहर के दौरान भोजन के पैकेट बांटने के दौरान मालीवाड़ा पहुंचे।


ये आदिवासी लोग इतने ईमानदार थे कि उन्होंने राशन और भोजन के पैकेट लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें कुछ दिन पहले ही पैकेट मिले थे। देशपांडे ने कहा कि उन्हें यह भी पता चला है कि इन आदिवासियों के बच्चे जो स्कूलों में नामांकित थे पढ़ लिख भी नहीं सकते थे और मराठी नहीं समझ सकते थे। उन्होंने कहा हमने इन बच्चों को उनके इलाके में ही सप्ताह में दो बार पढ़ाने के लिए हमारे साथ काम करने वाले तीन सेवानिवृत्त शिक्षकों को काम सौंपा।

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